परख
"परख" परख इंसान की बर्वक्त, यूँ ही कहाँ हो पाती है, हो पाती है जब तलक, देर बहुत हो जाती है। कातिल तुम्हारा दुश्मन हो, ये जरूरी तो नहीं, दोस्ती को परखने में कभी, देर बहुत हो जाती है। हद-ए-दोस्ती यारों अब, खुद से खुद तक जाती है, वो वादे इरादे समझने में, देर बहुत हो जाती है । कच्ची अंबियाँ बौरों से, झड़ती तो अब भी हैं, मिल बाँट कर चखने में, देर बहुत हो जाती है। खुदगर्जी के ऊपर जब ,मासूमियत का लिबास हो, चेहरे पढ़ने का हुनर पाने में, देर बहुत हो जाती है। लहरे गले लगा रहीं, साहिल तो यही समझते हैं, खुद के कटने की खबर तक, देर बहुत हो जाती है। प्यास केवल पानी से,अब कहा...