परख

                                "परख" 
 परख इंसान की बर्वक्त, यूँ ही कहाँ हो पाती है,
 हो पाती है जब तलक, देर बहुत हो जाती है। 
           कातिल तुम्हारा दुश्मन हो, ये जरूरी तो नहीं, 
           दोस्ती को परखने में कभी, देर बहुत हो जाती है। 
 हद-ए-दोस्ती यारों अब, खुद से खुद तक जाती है, 
वो वादे इरादे समझने में, देर बहुत हो जाती है । 
            कच्ची अंबियाँ बौरों से, झड़ती तो अब भी हैं, 
            मिल बाँट कर चखने में, देर बहुत हो जाती है।
 खुदगर्जी के ऊपर जब ,मासूमियत का लिबास हो,
 चेहरे पढ़ने का हुनर पाने में, देर बहुत हो जाती है।
            लहरे गले लगा रहीं, साहिल तो यही समझते हैं,
            खुद के कटने की खबर तक, देर बहुत हो जाती है। प्यास केवल पानी से,अब कहाँ बुझ पाती है, 
म्रग-त्रष्णा के मिटने में, देर बहुत हो जाती है।
            मुस्काते हुए फूलों के, बहारों के मायने क्या हैं,
            इशारे नादाँ समझने में, देर बहुत हो जाती है। 
 मुहब्बतों के बोल बाँटते, जो आस्तीनों में रहते हैं, 
दवा उनकी ढूँढने में, देर बहुत हो जाती है। 
             बातें किसी और जहाँ की, लगती हैं अब खुलूस की,                  इन्सानी ज़ज्बात तलाशने में, देर बहुत हो जाती है। 
        
                                               © महेन्द्र सिंह रौतेला

Comments

  1. Sorry to say I couldn't upload my poem in right format...this was my first post from Mobile phone.

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